25/03/18

पेनक्रियाटिक कैंसर (अग्नाशय कर्करोग)

पेनक्रिया-अग्नाशय
अग्नाशय मानव उदर में पीछे की ओर, मेरू के आगे स्थित एक स्राव ग्रंथि है जो पाचक रसों तथा हार्मोन किण्वक उत्प्रेरकों का स्राव करती है। रक्त शर्करा को नियंत्रण में रखने वाले रसों तथा उत्प्रेरक हार्मोन्स का उत्पादन तथा रिसाव अग्नाशय में होता है। अंतःस्रावक कोशिकाऐं, पाचक रस तथा बाह्यस्रावी कोशिकाऐं हार्मोन या किण्वक उत्प्रेरकों का निर्माण-स्राव करती है। अधिकतर पेनक्रियाटिक कैंसर बाह्यस्रावी कोषिकाओं में जन्म लेते हैं।
Pancreas

पेनक्रियाटिक कैंसर-अग्नाशय का कर्कट रोग
अग्नाशय रसग्रंथी की कोशिकाऐं, किसी कारणवश अनियंत्रित होकर संख्यावृद्धि करने लगती हैं और एक पिंड बना लेती हैं। यह अनियंत्रित पिंड कर्क रोग कहलाता है और यह कर्करोग युक्त कोशिकाएं शरीर के अन्य भागों पर भी आक्रमण करने में सक्षम होती हैं। यह अग्नाशय का-पेनक्रियाटिक, कर्करोग-कैंसर, विभिन्न प्रकार का होता है। आमतौर पर 85 प्रतिशत रोगियों में अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग-पेनक्रियाटिक एडीनोकार्सिनोमा, होता है। अग्नाशय के आंतरिक भाग में, पाचक किण्वक-उत्प्रेरक या डायजेस्टिव ऐंज़ाइम, का निर्माण व स्राव करने वाली कोशिकाओं में यह कर्करोग-कैंसर होता है। इसके अलावा, अन्य प्रकार के कैंसर, जो सम्मिलित रूप से नॉन-एडिनोकार्सिनोमा कहे जाते हैं, इन कोशिकाओं से प्रगट होते हैं। प्रति सैकड़ा प्रकरणों में एक या दो, तंत्रिकाअंतःस्रावी-न्यूरोएण्डोक्राइन, अर्बुद-ट्यूमर होते हैं। यह हार्मोन या रासायनिक दूत, का निर्माण व स्राव करने वाली कोशिकाओं से उदित होते हैं। यह एडिनोकार्सिनोमा-अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग, से कुछ कम आक्रामक होता है।
अधिकतर होने वाले पेनक्रियाटिक कैंसर- अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग के लक्षण व संकेतों में पीली त्वचा, उदर अथवा पीठ में पीड़ा, अचानक वजन में कमी, हल्के रंग का पुरीष या मल, गहरे रंग का मूत्र तथा क्षुधाह्वास या भूख में कमी। कैंसर-कर्करोग के आरंभिक चरण में न के बराबर लक्षण होते हैं, तथा रोग को अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग, निश्चित करने योग्य लक्षण तो कैंसर की उन्नत अवस्था तक दृष्टगत नहीं होते। फलतः नैदानिक अवस्था तक अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग, प्रायः शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका होता है।
Pancreas, Gull bladder and Duodenum (Cut)

अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर 40 वर्ष की अवस्था से पहले कदाचित ही होता है, तथा एडीनोकार्सिनोमा कैंसर तो 70 वर्ष से अधिक आयु के पश्चात ही देखने में आता है। तंबाखू सेवन, धूम्रपान, मोटापा तथा मधुमेह रोग में इसकी आशंका अधिक होती है, तथा इनमें अनुवांशिकी भी एक घटक है। लगभग 25 प्रतिशत लोगों में अग्नाशय का कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर धूम्रपान से जुड़ा होता है, तथा 5-10 प्रतिशत अनुवांशिक रूप से उत्तराधिकार में पाया जाता है। अग्नाशय कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर का निरूपण संयुक्त रूप से चिकित्सीय छविप्राप्ति-मेडीकल इमेजिंग की आधुनिक तकनीकों जैसे चरमध्वनि-अल्ट्रासाउंड, तथा शारीरिक अँगों की कम्प्यूटेड टोमाग्राफी-परत दर परत छायांकन, रक्त परीक्षण, तथा ऊतक परीक्षण-टिश्यू सेंपल (बायाप्सि) द्वारा किया जाता है। प्रारंभिक चरण स्टेज-1 से उन्नत चरण स्टेज-4 तक इस रोग को चरणबद्ध किया गया है। सामान्य व्यक्तियों का परीक्षण इस रोग में प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुआ है।
धूम्रपान से दूर रहने वाले व्यक्तियों में अग्नाशय के कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर की आशंका कम होती है, तथा स्वस्थ वजन बनाए रखने वाले, प्रकृमित-प्रोसेस्ड, लाल माँस के आहार से दूर रहने वाले व्यक्तियों में भी यह देखने में नहीं आता। धूम्रपान की लत वाले व्यक्ति भी अगर धूम्रपान छोड़ दें तो वे 20 वर्ष पश्चात सामान्य व्यक्तियों की श्रेणी में आ सकते हैं। अग्नाशय कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर, का उपचार शल्यक्रिया, रेडियो थेरेपी, कीमोथेरेपी, दोष घटाने वाली चिकित्सा अथवा इनके सम्मिश्रित उपचार से होता है। कर्करोग-कैंसर का इसकी अवस्था के अनुसार रोगोपचार का विकल्प होता है। शल्यक्रिया इसका एकमात्र उपचार है जिससे यह रोग संसाधित होता है और रोगी निरोग हो सकता है। स्वास्थप्रद जीवन यापन भी इस रोग के उपचार का एक विकल्प हो सकता है, यदि रोगी की अन्य उपचार करने की क्षमता न हो तो। पीड़ा प्रबंधन तथा पाचन क्षमता बढ़ाने की औषधि से उपचार भी समय-समय पर आवश्यक होते हैं। समय पर आरम्भ किया गया दोषों का शमन करने वाला चिकित्साविधान भी इसके उपचार में उद्यत रोगी के लिए संतुस्त-रिकमेंडेड है।

Langerhan Eyelets &
लेंगरहार्न आइलेट-अंतः एवं बाह्य स्रावक कोषिकाऐं जिनमें कर्करोग-कैंसर, होता है

वैश्विक रूप से कर्करोग-कैंसर रोग से होने वाली मृत्यु में वर्ष 2012 में सभी प्रकार का अग्नाशय कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर, सातवें स्थान पर होकर 3,30,000 तीन लाख तीन हजार व्यक्तियों की मृत्यु का कारण था। ब्रिटेन में यह कैंसर से होने वाली मृत्यु में पाँचवे स्थान पर है, तथा अमेरिका में चौथे। यह बीमारी विकसित देशों में अधिकतर देखने में आती है तथा वैश्विक नए प्रकरणों में 70 प्रतिशत अग्नाशय कर्करोग-पैनक्रियाटिक कैंसर, विकसित देशों में होते हैं। नैदानिक परीक्षणों के पश्चात रोगियों में एडिनोकार्सिनोमा-अग्नाशय ग्रंथि कर्करोग, का पूर्वानुमान दयनीय रूप से असफल है। मात्र 25 प्रतिशत रोगी एक साल तक और 5 प्रतिशत पाँच वर्ष तक जीवित रह पाते हैं। कर्करोग, जिनकी पहचान समय पर हो जाती है उनमें उत्तरजीविता 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। तंत्रिकाअंतःस्रावी-न्यूरोएण्डोक्राइन, अर्बुद-ट्यूमर के उपचार परिणाम अपेक्षाकृत अधिक सफल होते हैं। लगभग 65 प्रतिशत रोगी उपचार के पश्चात वर्तमान में जीवित हैं। हालांकि उत्तरजीविता अर्बुद-ट्यूमर के प्रकार पर निर्भर करती है। 
रेखाचित्र
विकिपीडिय़ा से संकलित

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