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25/01/18

कैंसर-कर्करोग के लक्षण

कैंसर-कर्करोग के लक्षण

संभावित कैंसर (कर्क रोग) की चेतावनी देने वाले पाँच लक्षण-इन्हें अनदेखा न करें।

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समय से पहले कैंसर को पहचानने के लिए कैंसर के नियमित परीक्षण ही सर्वोत्तम साधन है। अधिकतर लोग या तो लक्षणों की उपेक्षा करते हैं अथवा उन्हें अपनी स्थिति की गंभीरता का कोई अनुमान ही नहीं होता जब तक कि बहुत देर न हो जाए। तथापि, सामान्य जीवन में, कैंसर के लक्षण अस्पष्ट होते हैं कि कोई भी मुश्किल से ही इन लक्षणों की विशेषताओं को कैंसर के लक्षणों की तरह पहचान पाता हो।


कई बार मनुष्यों में कैंसर अचिंन्हित रह जाता है क्योंकि इसके लक्षणों को सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के लक्षणों की तरह मानकर इनकी चिकित्सा की जाती है। कैंसर के लक्षणों को समय रहते पहचानना कैंसर को समय पर पहचानना है जो कैंसर की पूर्ण तथा सफल चिकित्सा करने में सहायक होता है। कैंसर के लक्षणों में लघुशंका निवारण में बदलाव, निगलने में असुविधा, सामान्य वाणी में बदलाव आने से फटा स्वर निकलना, वजन में बगैर स्पषट कारण के कमी आना, नुख में बदलाव तथा उदर अथवा पेट के निचले भाग में पीड़ा होना। नियमित परीक्षण सर्वोत्तम साधन है कैंसर को समय पूर्व पहचानने का। 

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साधारण पीड़ा, कष्ट वेदना अथवा दुर्बलता या थकान जैसे लक्षण जो संभवतः कैंसर जनित हो सकते हैं। निम्न कुछ लक्षण हैं जो कैंसर के हो सकते हैं तथा जिनकि अवहेलना  या उपेक्षा करने से बचना चाहिए।

1. शारीरिक भार में अस्पष्टीकृत कमी


अचानक और हठात रूप से शारीरिक-भार का ह्वास उन लोगों के लिए ठीक है जो स्वास्थ्य कारणों से वजन कम करना चाह रहे हों। किंतु बिना किसी उद्यम अथवा परिश्रम के एकाएक शारीरिक भार का ह्वास चिंता का कारण है। इस प्रकार अचानक कम हुआ भार  अग्नाशय कर्क रोग, उदर कैंसर तथा फेफड़ों के कैंसर का द्यौतक हो सकता है। इनके अतिरिक्त शारीरिक भार का अनचाहे व अचानक कम होना अतिक्रियाशील थायराइड ग्रंथि, मधुमेह या शर्करा रोग, सिरोसिस-अधितंतुरूजा तथा टीबी-यक्ष्मा रोगों के कारणवश हो सकता है।

File:Landkartenzunge 003.jpg

2. लघुशंका त्याग क्रिया में बदलाव


लघुशंका त्याग की प्रक्रिया में बदलाव का अनुभव, जो कैंसर का द्यौतक हो सकता है। 
लक्षण:
मूत्रत्याग प्रक्रिया शुरू करने में मुश्किल होना।
मूत्रत्याग की क्रिया रोकने में तकलीफ होना।
मूत्रत्याग की धारा का वेग सामान्य से दुर्बल होना।
बूंद-बूंद या रिसकर मूत्र निकलना।
लघुशंका की आवश्यकता के अंतराल में बदलाव।
अंडकोषों के आकार में बदलाव, सूजन अथवा सिकुड़न महसूस होना अथवा गठान महसूस होना।
अंडकोशों में भारीपन महसूस होना।
शिश्नोत्थान में परेशानी।

3. मौखिक परिवर्तन:

मुँह तथा आहार नलिका पर कुछ परिवर्तन कैंसर के लक्षण हो सकते हैं
मुँह के अंदर सफेद दाग या चकत्ते
मुँह तथा आहार नली के आस पास लगातार दर्द रहना।
आहार निगलने में परेशानी।
निचले जबड़े को हिलाने में परेशानी होना।
टूटा दाँत या डाढ़ जो बगैर किसी उचित वजह के टूट गया हो।z
चेहरे पर सूजन।
लिजलिजापन अथवा संवेदनाहीन निचले होंठ, कपोल या जिव्ह्या।
जिव्ह्या पर रूखापन तथा उसके साथ रक्तस्राव।
लगातार और चेष्ठापूर्वक भी विद्यमान कफ तथा आवाज में कठोरता।
खाँसी के साथ रक्त आना।

4. वक्षस्थल में परिवर्तन

पुरुषों में वक्ष कैंसर दुर्लभ है और वैश्विक वक्षकैंसर के मामलों का लगभग एक प्रतिशत है। इसके नजरअंदाज होने की प्रमुख वजह शायद यही है और अधिकतर पुरुष इसके लक्षणों को अनदेखा कर देते हैं। पुरुषों में वक्षकैंसर एस्ट्रोजन नामक हार्मोन के स्राव में वृद्धि के फलस्वरूप, हानिप्रद विकिरण की हद में आने से तथा परिवारिक पृष्ठभूमि में वक्षकैंसर होने से हो सकता है। वाहिनीपरक घुसपैठिया कर्कटरोग-डक्टल कार्सिनोमा पुरुषों में अधिकतर होने वाला वक्षकैंसर है। पुरुषों में वक्षस्थल के कर्कटरोग के विभिन्न लक्षणों में कुछ निम्न लक्षण हैं।
वक्षस्थल का आकार बढ़ना।
वक्ष के अग्रभाग, निप्पल में दर्द।
निप्पल का उलटना अथवा अंदर की ओर दबना।
निप्पल पर वृण अथवा घाव, आसपास लाल घेरा बनना।
वक्ष में गठान जिसमें दर्द महसूस हो सकता है और नहीं भी।
निप्पल से स्राव जो पारदर्शी अथवा लाल या काला हो सकता है।
बगलों की लसीकापर्व या ग्रंथि में सूजन होना।
निप्पल पर या के ईर्द-गिर्द पपड़ीयुक्त लालिमा  होना।
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5. उदर या पेट लंबंधी लक्षण:

उदरपीड़ा अथवा उदरशशूल कैंसर के अलावा कई रोगों के लक्षण हो सकते हैं। किन्तु कोई भी इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता जब लगातार और ढीट रोग की तरह उदरपीड़ा प्रयत्न करने पर भी कम या दूर न होती हो। उदरलक्षण या पीड़ा जो कैंसर का लक्षण हो सकती है निम्न हो सकती है:
क्षीण क्षुधा अथवा भूख महसूस न होना।
अम्लपित्त जो पुराना अथवा लगातार काफी समय से विद्यमान हो।
हृदय में शूल अथवा हृदयाग्नि जो उदर तथा कण्ठ कैंसर हो सकता है।
वमन अथवा रक्तयुक्त वमन।
पेट फूलना, उदर में पानी भरना जिसे जलोदर भी कहते हैं।
उदरपीड़ा जो पेट के अंदर दबने जैसी होती है, पेनक्रियाटिक-अग्न्याशय कैंसर लक्षण हो सकती है।
उदर की जकड़न तथा बिगड़ा पेट जो लिवर-यकृत कैंसर का लक्षण हो सकता है।
अत्यन्त अल्प भोजन के पश्चात ही पेट भरा हुआ महसूस होना।
मूत्र में अथवा मल में रक्त विद्यमान होना जो कि किडनी-वृक्क कैंसर, मूत्राशय-ब्लाडर कैंसर अथवा बृहदांत्र-कोलन कैंसर का लक्षण हो सकता है।


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09/08/15

इबोला


(CNN)
इबोला वायरस का इतना डर क्यूं है? 
Medecins Sans Frontieres (MSF)
इबोला विश्व की भयानकतम संक्रामक बिमारियों में से एक है। क्योंकि इबोला रोगाणु-वायरस का तीव्र संक्रमण इससे संक्रामित 90% प्रतिशत लोगों की जान ले लेता है। अब तक इस वायरस का कोई टीका नहीं खोजा जा सका था।
इबोला वायरस के संक्रमण से रक्तस्रावी बुखार होता है। 
बुंडीबिग्यो, यूगांडा का एक प्रदेश जहाँ यह वायरस 2007 में खोजा गया, तथा सूडान और ज़ायरे वर्ग। ए

इबोला के लक्षण क्या हैं?
शुरूआती लक्षणों में अचानक से तेज बुखार. कमजोरी, माँसपेशियों में दर्द, सिर में तेज दर्द तथा खराब गला। 
यह प्रारंभिक लक्षण बाद में उल्टी, दस्त, कमजोर लीवर व किडनी और कभी कभी आंतरिक तथा बाह्य रक्तस्राव में बदल जाते हैं।
इलाज
ईबोला का कोई निर्घारित इलाज नहीं है। संक्रमण प्रभावित व्यक्ति को अलग-थलग रख कर इलाज शुरू किया जाता है।
क्या इस संक्रामक बीमारी के इलाज की कोई दवा है
दो अमेरिकी मिशनरी कर्मियों को ईबोला का संक्रमण होने पर ZMapp नामक प्रयोगात्मक दवा दी गई थी, जिसने उनकी  प्राणरक्षा की। 
यह दवा, जो एक सॅन डियेगो की कम्पनी ने बनाई थी, मनुष्यों पर परीक्षित नहीं थी, लेकिन बंदरों पर किये गए इसके परीक्षणों के अच्छे परिणाम प्राप्त हुए थे। 




(CNN) विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूचना के अनुसार जानलेवा इबोला वायरस से बचाव का नव-विकसित टीका बहुत असरदार सिद्ध हुआ है, और इससे इस जानलेवा वायरस द्वारा वर्तमान तथा भविष्य में फैलने वाले संक्रमण से बचने में मदद मिलेगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की विज्ञप्ति के अनुसार इसके प्राथमिक परीक्षण इस मार्च से अफ्रीकी देश 'ग्वीनिया' में शुरू किये गए थे, जो तीन वर्तमान संक्रमण पीड़ित देशों में से एक है। 
इसके आशानुकूल परिणाम आने पर तत्काल निर्णय लेकर संक्रमण के सभी संभावित व्यक्तियों को यह टीका लगाया गया जो संक्रमित रोगी के संपर्क में आए थे। सिंगल डोज़ या ऐकल खुराक के इस टीके का नाम VSV-EBOV वेक्सीन है। सभी स्वास्थ्य कर्मियों तथा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क घेरे रिंग में  आए हुए लोगों का टीकाकरण किया  गया है। अभी तक के परिणाम 100% रहे हैं, हालांकि अभी और अण्वेषण रिसर्च की आवश्यकता है।

http://edition.cnn.com/2015/07/31/health/guinea-ebola-vaccine/index.html


June 3, 2020 -- The United Nations Children's Fund said Monday that five people have died of Ebola in a new outbreak in the Democratic Republic of Congo (DRC), CNN reported Tuesday.
One of the dead was a 15-year-old girl and a total of nine cases have been reported.
"Four additional people who contracted the virus -- all contacts of the deceased and including the child of one of the fatal cases -- are being treated in an isolation unit at the Wangata Hospital in Mbandaka," UNICEF said in a statement.
"The deaths occurred between the 18th and 30th of May but they were only confirmed as Ebola-related yesterday."
It's the DRC's 11th outbreak of Ebola. The country is still coping with an outbreak that began in 2018 and killed more than 2,200, CNN said.
"The announcement comes as a long, difficult and complex Ebola outbreak in eastern Democratic Republic of the Congo is in its final phase, while the country also battles COVID-19 and the world's largest measles outbreak," the World Health Organization said in a statement.
The DRC has reported nearly 3,200 cases of coronavirus and 72 deaths and nearly 370,000 cases of measles with nearly 6,800 deaths since 2019, CNN reported.

02/08/15

डैंगू



तत्कालीन ज़ीका वायरस के लिए सर्वाधिक कारक प्रजाति वही है जो डेंगू वायरस तथा यलो फीवर की प्राथमिक वाहक है।

डेंगू और प्रचंड (गंभीर) डेंगू

कुछ तथ्य:

  1. डेंगू एक मच्छरों द्वारा (काटने से) फैलनेवाला संक्रामक रोग है।
  2. डेंगू के संक्रमण में फ्लू के बुखार जैसे लक्षण होते हैं। यह संक्रमण कभी कभी प्रचंड (गंभीर) डेंगू में बदल जाता है, जिसमें घातक जटिलताऐं पैदा हो जाती हैं।
  3. पिछले कुछ दशकों से समस्त विश्व में, आकस्मिक रूप से डेंगू तथा  प्रचंड (गंभीर) डेंगू के संक्रमण की व्यापकता तीव्र हुई है।
  4. वर्तमान में समस्त विश्व की आधी आबादी इसके संक्रमण क्षेत्र में है।
  5. डेंगू संक्रमण समस्त विश्व के उष्णकटिबंधीय तथा समशीतोष्ण प्रदेशों के शहरी तथा अर्धशहरी हिस्सों में फैलता है।
  6. प्रचंड (गंभीर) डेंगू संक्रमण ऐशियाई तथा लेटिन अमरीकी देशों के बच्चों में बीमारी तथा मौत का मुख्य कारण है। 
  7. डेंगू अथवा प्रचंड (गंभीर) डेंगू के संक्रमण का कोई निश्चित या विशेष इलाज नहीं है, लेकिन शीघ्र विवेचन और त्वरित चिकित्सा के साथ उचित देखभाल से अकालमृत्यु दर को सिर्फ 1% तक सीमित किया जा सकता है।
  8. डेंगू संक्रमण से बचाव करने और उसपर काबू करने हेतु, सिर्फ सही दिशा में तथा प्रभावकारी प्रयास ही एकमात्र विकल्प है।
http://www.who.int/mediacentre/factsheets/fs117/en/#.VbfgtR-ZIRY.linkedin

·        डेंगू और मलेरिया
डेंगू
मलेरिया
डेंगू संक्रमण मादा ऐडीस मच्छर,और उसकी विभिन्न प्रजातियों द्वारा काटे जाने से होता है। और विभिन्न प्रजातियों से अलग-अलग समय पर संक्रमण होता है।
मलेरिया एक तीव्र या स्थाई (पुराना) रक्त संक्रमण है, जो लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद होता है। यह एक मनुष्य से दूसरे तक एनॉफिलीज़ मच्छर द्वारा काटने से फैलता है।
 ·        https://www.linkedin.com/grp/post/120372-6031888655197421569



आइये इसे विस्तार से समझते  हैं :

डेंगू बुखार एक बहुत संक्रामक रोग है । इसे हड्डी तोड़ रोग के नाम से भी जाना जाता है। ये मच्छरों  के काटने के कारण होता है। उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह बड़ी तेजी से फैलता है। 1950 के दशक में सबसे पहले फिलीपींस और थाईलैंड में डेंगू के संक्रमण का पहला मामला सामने आया था। अब भारत तथा लैटिन अमेरिका के कई देशों में डेंगू महामारी की तरह फैल रहा है। 
कुछ डेंगू मामलो में ये रोग जीवन-ग्राही रक्तस्रावी बुखार में बदल जाता है जिसके परिणामस्वरूप  रक्तस्राव, ब्लड प्लेटलेट्स  में  निम्न स्तर और रक्त प्लाज्मा में रिसाव होता है।
डेंगू बुखार मच्छरों  की कई प्रजातियों  जिसमें जीनस एडीज, मुख्यत: एडीस ए-एजिप्टी के द्वारा फैलता है। हल्के  या मध्यम  डेंगू के  उपचार में रिहाइड्रेशन के लिए मौखिक या नसों में  सीधे तरल पदार्थ दिया जाता है।  गंभीर डेंगू  के होने पर नसों में तरल पदार्थ के साथ रक्त रक्ताधान भी होता है ।
लक्षण
डेंगू के लक्षण सामान्यत: तीन से चौदह दिनों के अंदर विकसित होते है। इसके बाद डेंगू का वायरस इंक्युबेशन की अवधि में (डेंगू का मच्छर काटने के बाद से डेंगू का लक्षण विकसित होने तक की अवधि को इंक्युबेशन अवधि कहते है) उजागर होता है।  साधारणतः यह अवधि चार से सात दिन की हो सकती है।
डेंगू के लक्षण निम्नलिखित है:-
·       अचानक तीव्र ज़्वर
·       सिरदर्द (सामान्यत आंखों में दर्द होता है)
·       मांसपेशियों और जोड़ों में भयानक दर्द
·       चकत्ते निकलना
·       ठंड लगना (कांपना )
·       त्वचा पर लाल चकत्ते बनना 
·       मुँह पर निस्तब्धता आना 
·       भूख न लगना
·       गले में खराश
·       असामान्य रूप से कान, मसूड़ों और पेशाब आदि से ख़ून बहना

कारण
डेंगू संक्रमित मच्छर से फैलता है, जिसे एडीज एजिप्टी मादा मच्छर कहते है।  सामान्यत: यह मच्छर दिन में और कभी-कभी रात में काटता है। डेंगू का वायरस आरएनए फ्लैविवीरिद परिवार से है। इस रोग के वायरस चार प्रकार के होते हैं, जिन्हें सिरोटाइप कहा जाता है।  ये निम्नलिखित है:- डेन-1, डेन-2, डेन-3 और डेन-4
डेंगू वायरस का प्रसार एक चक्र के अंतर्गत होता है। जब मादा मच्छर द्वारा संक्रमित व्यक्ति को काटा जाता है। इसके बाद जब यही मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तब यह वायरस व्यक्ति में चला जाता है और इस तरह यह चक्र लगातार चलता रहता है।
रोग निदान
अत्यधिक तीव्र ज़्वर(चालीस डिग्री सेल्सियस से अधिक)होने पर संभावित रोग की पहचान निम्नलिखित दो के आधार पर की जाती है:-
·       गंभीर सिरदर्द
·       आँखों में दर्द अपितु आँखों को हिलाने और डुलाने में भी तकलीफ़ का होना
·       मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द
·       मतली या उल्टी होना
·       ग्रंथियों में सूजन

सूक्ष्म परीक्षण:
शीघ्रातिशीघ्र प्रयोगशाला में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं की संख्या के कम होते स्तर की जांच जाती है ताकि इसके द्वारा कम प्लेटलेट्स और  मेटाबॉलिक ऐसिडोसिस को देखा सकें। आमतौर पर लीवर से अमीनो ट्रांस्फ़्रेज़ का सामान्य उच्च स्तर (एएसटी और एएलटी) कम प्लेटलेट्स और सफेद रक्त कोशिकाओं के साथ जुड़ा हुआ है।
रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट:
रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट विशेष रूप से एंटीडेंगू आईजीजी और आईजीएम एंटीबॉडी की जाँच करने में एक उत्कृष्ट कार्यप्रणाली प्रदान करता है। आईजीजी एंटीबॉडी के हाई टाइटर की मौजूदगी, आईजीएम एंटीबॉडी के नमूने का पता लगाने में बाधा उत्पन्न नहीं करती है।   
इसका परीक्षण अत्यधिक शुद्ध डेंगू प्रोटीन मिश्रण के उपयोग द्वारा डेंगू के समस्त चारों तरह के सिरोटाइप का पता लगाया जा सकता है।
प्रबंधन
वर्तमान समय में, डेंगू का उपचार लक्षण के अनुसार:-
एस्प्रीन आदि दवाईयां लेने से रक्तस्त्राव बढ जाता है। इनके उपयोग से बचना चाहिए इनके स्थान पर पेरासिटामोल जैसी दवाईयां दर्द में सहायता करती है। बिस्तर पर उचित आराम और तरल पदार्थ का व्यापक सेवन करें। अगर तीन से पांच दिनों के बाद भी हालत में सुधार नहीं होता है तो चिकित्सक से सलाह ले।
जटिलता
संभावित रूप से एक व्यक्ति गंभीर डेंगू से पीड़ित है उसे अति गंभीर डेंगू के रूप में जाना जाता है। इसका कारण अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन इसके ख़तरे का मुख्य कारण पहले से संक्रमित होना होगा। प्राय: आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। अति गंभीर डेंगू के लक्षणों से पीड़ित व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
अति गंभीर डेंगू से पीड़ित व्यक्तियों के साथ एक अन्य समस्या यह है कि वे अचानक कम रक्तचाप का अनुभव कर सकता हैं। इसे डेंगू आघात सिंड्रोम के रूप में जाना जाता है। डेंगू आघात सिंड्रोम के लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं:-
·       ठंडी और चिपचिपी त्वचा
·       कमज़ोर नब्ज़ चलना
·       सूखा गला
·       पेशाब में कमी
·       साँस का तेज़ चलना
रोकथाम
·       डेंगू से बचने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन बाज़ार में उपलब्ध नहीं है।
·       इसकी रोकथाम का सबसे सरल उपाय यह है कि मच्छरों के काटने से बचा जाएं।
·       दिन में मच्छर के काटने से बचने वाले उत्पादों का प्रयोग करें।
·       मच्छरदानी लगाकर सोएं।
बाहर जाते समय पूरी बाँह व लंबी पैंट आदि कपड़ों का प्रयोग करें। शरीर को मच्छर के काटने से बचने के लिए कीटनाशक उत्पादों (डीईईटी से युक्त) का प्रयोग करें। विशेषत: जब आप डेंगू प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करें तो शरीर के अधिकांश भागों को ढक कर रखें। मच्छरों की प्रजनन क्षमता को कम करने के लिए पानी के कंटेनर को ठीक तरह से हमेशा कवर  करके रखें।
और जानने के लिऐ देखिये-
http://hi.nhp.gov.in/disease


जोखिम


डेंगू से पीड़ित वयस्कों से अधिक शिशुओं तथा बच्चों में बीमारी की गंभीरता होने की अधिक संभावना होती है। बच्चे यदि अच्छी तरह से पोषित हों तो उनके गंभीर रूप से बीमार होने की अधिक संभावना है (यदि वे स्वस्थ हैं तथा अच्छी तरह से पोषित हैं)। (यह अन्य दूसरे संक्रमणों से भिन्न है जो कुपोषित, अस्वस्थ, या अच्छे पोषण की कमी वाले बच्चों में अधिक गंभीर होते हैं।) महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में गंभीर बीमारी की संभावना अधिक होती है। पुरानी (दीर्घ-अवधि) की बीमारियां जैसे मधुमेह तथा अस्थमा वाले लोगों में डेंगू जीवन के लिये खतरा हो सकता है।
https://hi.wikipedia.org

05/04/15

स्वाइन फ्लू



स्वाइन फ्लू:


सर्दी-जुकाम-खाँसी, बोलने सुनने में मामूली बीमारियाँ हैं, लेकिन जब इनपर सवार होकर छद्म वेश में जानलेवा विषाणु सांसारिक जीवों में प्रवेश करते हैं, तब स्थिति बेकाबू भी हो सकती है। सर्दी और खाँसी जैसी मामूली बीमारी, व्यक्ति विशेष के अनुसार प्रभाव करती है।

इंफ्लूऐंजा फ्लू का विषाणु- वायरस सारे संसार में फैला हुआ है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में प्रवेश कर फैलता जाता है। यह ना सिर्फ सामाजिक और वाणिज्यिक रूप से असर डालता है, वरन सैकड़ों हजार की संख्या में मानव जीवन की बलि ले लेता है, याद करें 2009 में फैली स्वाइन फ्लू की महामारी। परिणामस्वरूप इंन्फ्लूऐंजा अब लगभग हर देश की सरकार और स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता सूचि में है।



यह एक कदाचित कम ही फैलने वाला विषाणु-वायरस है, जो मनुष्यों और शूकरों में फैलता है। इस वायरस को और आगे विभागित नहीं किया गया है और अभी यह महामारी के रूप् में सामने नहीं आया है।






स्वाइन फ्लू : 

यदि किसी व्यक्ति को सर्दी-खांसी है और उसके साथ उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही है या 101 डिग्री से ज़्यादा का ज्वर- बुखार है तो इसे बिलकुल नज़रंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये लक्षण स्वाइनफ़्लू <






ये लक्षण हैं बीमारी की पहचान, ये उपाय बचा सकते हैं जान
उनके मुताबिक़ हर बार सर्दी-खांसी स्वाइन फ़्लू का संकेत नहीं देती, फिर भी सर्दी-खांसी होने पर अतिरिक्त सावधानी रखना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि उसके साथ यदि सांस लेने में तकलीफ होने लगे या तेज़ बुखार आ जाए तो तुरंत किसी चिकित्सालय-अस्पताल में जाकर जांच कराना चाहिए, क्योंकि ज़्यादातर मामलों में ऐसी स्थिति स्वाइन फ़्लू का संकेत देती है और इसका का इलाज जितनी जल्दी शुरू किया जाए इससे बचने की संभावनाएं उतनी ज़्यादा बढ़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में आराम करने के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए, ताकि निर्जलीकरण- डी-हाइड्रेशन ना हो। वर्ना रोग बढ़ सकता है।

आयुर्वेद देता है बचने के नुस्खे :

आयुर्वेदिक चिकित्सक ड़ाॅ लोकेश जोशी के मुताबिक़ तुलसी के पत्ते, कपूर और इलायची का उपयोग स्वाइन फ़्लू के वायरस से प्राथमिक बचाव देता है। इन तीनों को समान मात्रा में लेकर पीस कर एक छोटी पुड़िया बनाकर अपने साथ रख लेना चाहिए। समय-समय पर इसकी सुगंध-खूशबू सूंघने से शरीर में इस वायरस का मुकाबला करने की शक्ति बढ़ जाती है।


ऐसे बचेंः
 - जहां तक हो, भीड़ से बचकर रहें।

 - सेनेटाइजर का उपयोग करना बेहतर होगा।
 - ज्यादा लोगों से मिल रहे हैं तो थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ जरूर धोएं।
 - घर में किसी को सर्दी-खांसी-जुकाम हो तो उसे अलग रखें और खांसते समय मुंह पर रूमाल ज़रूर रखें।

स्वाइन फ्लू ने सारे देश में दहशत मचा रखी है। अचानक यह महामारी सुरसा की तरह फैली और देखते ही देखते महानगरों को अपनी चपेट में ले लिया। आमतौर पर पशुओं और पालतू जानवरों को होने वाले वायरस के हमले कभी इंसानों तक नहीं पहुँचते। इसकी वजह यह है कि जीव विज्ञान की दृष्टि से इंसानों और जानवरों की बनावट में फर्क है। अभी देखा यह गया था कि जो लोग सूअर पालन के व्यवसाय में हैं और लंबे समय तक सूअरों के संपर्क में रहते हैं, उन्हें स्वाइन फ्लू होने का जोखिम अधिक रहता है।

मध्य 20वीं सदी से अब तक के चिकित्सा इतिहास में केवल 50 प्रकरण- केसेस ही ऐसे हैं जिनमें वायरस सूअरों से इंसानों तक पहुँचा हो। ध्यान में रखने योग्य यह बात है कि सूअर का माँस खाने वालों को यह वायरस नहीं लगता क्योंकि पकने के दौरान यह नष्ट हो जाता है।


क्या है लक्षणः
स्वाइन फ्लू के लक्षण भी सामान्य एन्फ्लूएंजा के लक्षणों की तरह ही होते हैं।
तीव्र ज्वर- बुखार, तेज ठंड लगना, गला खराब हो जाना, मांसपेशियों में दर्द होना, तेज सिरदर्द होना, खाँसी आना, कमजोरी महसूस करना आदि लक्षण इस बीमारी के दौरान उभरते हैं। इंसानों में जो स्वाइन फ्लू का संक्रमण हुआ है, वह तीन अलग-अलग तरह के विषाणु के सम्मिश्रण से उपजा है। फिलहाल इस वायरस का उद्गम अज्ञात हैं।

वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन फॉर एनिमल हैल्थ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह वायरस अब केवल शूकरों तक सीमित नहीं है, इसने इंसानों के बीच फैलने की शक्ति प्राप्त कर ली है। एन्फ्लूएंजा विषाणु-वायरस की खासियत यह है कि यह लगातार अपना स्वरूप बदलता रहता है। इसकी वजह से यह उन प्रतिरोधक- एंटीबॉडीज को भी छका देता है जो पहली बार हुए एन्फ्लूएंजा के दौरान विकसित हुई थीं। यही वजह है कि एन्फ्लूएंजा के टीका वैक्सीन का भी इस विषाणु पर असर नहीं होता।

क्या है खतरा ः

सन् 1930 में पहली बार एच1एन1 वायरस के सामने आने के बाद से 1998 तक इस वायरस के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। 1998 और 2002 के बीच इस वायरस के तीन विभिन्न स्वरूप सामने आए।
इनके भी 5 अलग-अलग आनुवांषिक जीनोटाइप थे।
मानव जाति के लिए जो सबसे बड़ा जोखिम सामने है वह है स्वाइन एन्फ्लूएंजा वायरस के म्यूटेट करने का जो कि स्पेनिश फ्लू की तरह घातक भी हो सकता है।
चूँकि यह इंसानों के बीच फैलता है इसलिए सारे विश्व के इसकी चपेट में आने का खतरा है।


कैसे बचेंगे ः

शूकरों को एविएन और ह्यूमन एन्फ्लूएंजा श्रृंखला- स्ट्रेन दोनों का संक्रमण हो सकता है। इसलिए उसके शरीर में एंटीजेनिक शिफ्ट के कारण नए एन्फ्लूएंजा स्ट्रेन का जन्म हो सकता है। किसी भी एन्फ्लूएंजा के विषाणु का मानवों में संक्रमण श्वांस प्रणाली के माध्यम से होता है। इस विषाणु से संक्रमित व्यक्ति का खाँसना और छींकना या ऐसे उपकरणों का स्पर्श करना जो दूसरों के संपर्क में भी आता है, उन्हें भी संक्रमित कर सकता है।
जो संक्रमित नहीं वे भी दरवाजों के हैंडल, टेलीफोन के रिसीवर या टॉयलेट के नल के स्पर्श के बाद स्वयं की नाक पर हाथ लगाने भर से संक्रमित हो सकते हैं।



क्या है सावधानियाँ 

सामान्य एन्फ्लूएंजा के दौरान रखी जाने वाली सभी सावधानियाँ इस विषाणु के संक्रमण के दौरान भी रखी जानी चाहिए। 

बार-बार अपने हाथों को साबुन या ऐसे सॉल्यूशन से धोना जरूरी होता है जो विषाणु का खात्मा कर देते हैं। 

नाक और मुँह को हमेशा मॉस्क पहन कर ढँकना जरूरी होता है। 

इसके अलावा जब जरूरत हो तभी आम जगहों पर जाना चाहिए ताकि संक्रमण ना फैल सके।


क्या है इलाजः

संक्रमण के लक्षण प्रकट होने के दो दिन के अंदर ही एंटीवायरल ड्रग देना जरूरी होता है। इससे एक तो मरीज को राहत मिल जाती है तथा बीमारी की तीव्रता भी कम हो जाती है। तत्काल किसी अस्पताल में मरीज को भर्ती कर दें ताकि पैलिएटिव केअर शुरू हो जाए और तरल पदार्थों की आपूर्ति भी पर्याप्त मात्रा में होती रह सकें। अधिकांश मामलों में एंटीवायरल ड्रग तथा अस्पताल में भर्ती करने पर सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है।

कड़वा चिरायताः

मलेरिया, डेंगू या स्वाइन फ्लू सबकी छुट्टी कर देगा कड़वा चिरायता...
चिरायते का नाम अधिकांश लोगों ने सुन रखा होगा। बरसों से हमारी दादी-नानी कड़वे चिरायते से बीमारियों को दूर भगाती रही है। असल में यह कड़वा चिरायता एक प्रकार की जड़ी-बूटी है जो कुनैन की गोली से अधिक प्रभावी होती है। एक प्रकार से यह एक देहाती घरेलू नुस्खा है। पहले इस चिरायते को घर में सुखा कर बनाया जाता था लेकिन आजकल यह बाजार में कुटकी चिरायते के नाम से भी मिलता है। लेकिन अधिक कारगर तो घर पर बना हुआ ताजा और विशुद्ध चिरायता ही अधिक कारगर होता है।


चिरायता बनाने की विधिः

100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें।
मात्र दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा।

कारगर एंटीबॉयोटिकः

बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।


* अगर आप यह चूर्ण ना बना पाये तो अच्युताय संजीवनी टेबलेट कि २ गोलियाँ सुबह खाली पेट चूसकर खाएं । यह गोली व्यक्ति को शक्तिशाली, ओजस्वी, तेजस्वी व मेधावी बनाती है । इसमें सभी रोगों का प्रतिकार करने तथा उन्हें नष्ट करने की प्रचंड क्षमता है । यह श्रेष्ठ रसायन द्रव्यों से संपन्न होने से सप्तधातु व पंचज्ञानेन्द्रियों को दृढ बनाकर वृद्धावस्था को दूर रखती है । ह्रदय , मस्तिष्क व पाचन संस्थान को विशेष बल प्रदान करती है ।

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